फर्जी कागताज पर 26 लाख का भुगतान
जिले में बनाये जा रहे लगभग 104 किमी सीमा सड़क के लिए भूमि अधिग्रहण और प्रकृति निर्धारण में गड़बड़ी की जांच चल ही रही है। इसी बीच अब एक भूधारी को कथित तौर पर फर्जी एलपीसी और लगान रसीद के आधार पर 26.50 लाख रुपया मुआवजा भुगतान करने का मामला प्रकाश में आया है। यह मामला सामने आते ही जिला भू अर्जन कार्यालय भुगतान की संचिका खंगालने में जुट गया है। फर्जी रसीद और एलपीसी पर भुगतान का खुलासा आरटीआई के जवाब से हुआ है। अभी एक माह से सीमा सड़क निर्माण में अधिग्रहित भूमि को भूमाफिया ने मिलीभगत कर गलत तरीके से कृषि जमीन को आवासीय दिखाकर लाखों रूपये अधिक भुगतान लेने की जांच जारी ही है। इस बीच यह बखेड़ा खड़ा होने से हड़कंप मच गया है। नरपतगंज अंचल अंतर्गत नवाबगंज पंचायत के मुकेश कुमार साह ने नरपतगंज सीओ से नवाबगंज मौजा के खेसरा 1407, 1026 व 1027 के नामांतरण को लेकर जानकारी मांगी थी। सीओ ने 27 जुलाई को सुचना उपलब्ध कराया । इसमें स्पष्ट है कि वर्णित खाता, खेसरा की जमीन का उक्त तिथि तक नामांतरण हुआ ही नहीं। जवाब मिलने के बाद ही मुकेश साह ने जिला भूअर्जन पदाधिकारी को आवेदन देकर कार्रवाई की मांग की है। मुकेश साह ने आवेदन में लिखा है कि प्राप्त सुचना से स्पष्ट हुआ कि विजय कुमार साह व अजय कुमार साह ने फर्जी लगान रसीद और फर्जी एलपीसी पर भुगतान लिया है।अजय को 9.40लाख तो विजय को 17.23 लाख का भुगतान: इस मामले में जब हिन्दुस्तान ने पड़ताल की तो पता चला कि जिला भूअर्जन कार्यालय द्वारा 2016 में ही मुआवजा भुगतान कर दिया गया है। कार्यालय ने मूल लगान रसीद और मूल एलपीसी के आधार पर भुगतान किए जाने का दावा किया। बताया गया कि जयनारायण साह के पुत्र अजय साह को खेसरा 1026 अंतर्गत छह डिसमिल का 940078 रुपया मुआवजा मिला। जबकि विजय साह को खेसरा 1026 ,1027 अंतर्गत 11 डिसमिल जमीन के एवज में 1723476 रुपया मुआवजा मिला।कानूनगो की रिपोर्ट व स्थलीय जांच पर हुआ भुगतान: जानकारी के अनुसार जिला भूअर्जन कार्यालय के तत्कालीन कानूनगो के जांच रिपोर्ट और स्थलीय जांच प्रतिवेदन के आधार पर भुगतान किया गया है। अमीन घोतन सिंह, डीएलओ कार्यालय अमीन अजय कुमार झा व कानूनगो ने साथ सितंबर 2016 को स्थलीय जांच रिपोर्ट सौंपा है। जिसपर जिला भूअर्जन पदाधिकारी का भी हस्ताक्षर है।आरटीआई का जवाब सही या रसीद व एलपीसी गलत: इस पूरे प्रकरण से एक सवाल पैदा हो गया है कि आखिर आरटीआई का जवाब सही है या एलपीसी व लगान रसीद फर्जी है। अगर डीएलओ कार्यालय ने उसी रसीद व एलपीसी को सत्य माना तो भुगतान से पहले उसका सत्यापन क्यों नहीं कराया। एक सवाल यह भी है कि अगर रसीद और एलपीसी भी ऑरिजिनल है तो सुचना के अधिकार अधिनियम के तहत निर्गत जवाब क्या है। ऐसा इसलिए कि एलपीसी में सीओ व कर्मचारी का हस्ताक्षर है और आरटीआई का जवाब भी सीओ ने ही दिया है। जबकि रसीद कर्मचारी ने निर्गत किया है। तब कौन सही और कौन गलत है।
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